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जैन तीर्थंकर

वर्धमान महावीर

Vardhamana Mahavira

जैन परंपरा के चौबीसवें तीर्थंकर, जिन्होंने अहिंसा को केवल नियम नहीं, पूरे जीवन-दर्शन का केंद्र बनाया।

Probableसंभावित

काल

c. 599–527 BCE (जैन परंपरा)

Seasons

The honest version

हम असल में क्या जानते हैं?

साक्ष्य और परंपरा, अलग-अलग

यह किसी परंपरा का अपमान नहीं है। यह सिर्फ़ यह बताना है कि किस बात के पीछे समकालीन प्रमाण है, और कौन-सी बात हम तक बहुत बाद के ग्रंथों से पहुँची।

साक्ष्य

प्रमाणित या अत्यंत संभावित

  • बौद्ध ग्रंथों में समकालीन प्रतिद्वंद्वी 'निगंठ नातपुत्त' के रूप में उल्लेख — यानी बाहरी पुष्टि

परंपरा

बाद के ग्रंथों और लोक-स्मृति से

  • जन्म-कल्याणक की कथाएँ
  • गर्भ-परिवर्तन की श्वेतांबर मान्यता

विवादित

जहाँ इतिहासकार असहमत हैं

  • तिथियाँ — श्वेतांबर और दिगंबर परंपराएँ तथा आधुनिक विद्वान अलग-अलग गणना देते हैं

परिवार

  • पिता सिद्धार्थ (ज्ञातृक कुल)
  • माता त्रिशला

उपलब्धियाँ

  • अनेकांतवाद — सत्य को एक से अधिक दृष्टियों से देखने का सिद्धांत
  • पाँच महाव्रत, जिनमें अहिंसा सर्वोपरि
  • श्रमण परंपरा को संगठित रूप

विरासत

जैन धर्म; और भारतीय विचार में अहिंसा तथा तर्क-सहिष्णुता की वह धारा जो सदियों बाद गांधी तक पहुँचती है।