जैन तीर्थंकर
वर्धमान महावीर
Vardhamana Mahavira
जैन परंपरा के चौबीसवें तीर्थंकर, जिन्होंने अहिंसा को केवल नियम नहीं, पूरे जीवन-दर्शन का केंद्र बनाया।
The honest version
हम असल में क्या जानते हैं?
साक्ष्य और परंपरा, अलग-अलगयह किसी परंपरा का अपमान नहीं है। यह सिर्फ़ यह बताना है कि किस बात के पीछे समकालीन प्रमाण है, और कौन-सी बात हम तक बहुत बाद के ग्रंथों से पहुँची।
साक्ष्य
प्रमाणित या अत्यंत संभावित
- बौद्ध ग्रंथों में समकालीन प्रतिद्वंद्वी 'निगंठ नातपुत्त' के रूप में उल्लेख — यानी बाहरी पुष्टि
परंपरा
बाद के ग्रंथों और लोक-स्मृति से
- जन्म-कल्याणक की कथाएँ
- गर्भ-परिवर्तन की श्वेतांबर मान्यता
विवादित
जहाँ इतिहासकार असहमत हैं
- तिथियाँ — श्वेतांबर और दिगंबर परंपराएँ तथा आधुनिक विद्वान अलग-अलग गणना देते हैं
परिवार
- पिता सिद्धार्थ (ज्ञातृक कुल)
- माता त्रिशला
उपलब्धियाँ
- अनेकांतवाद — सत्य को एक से अधिक दृष्टियों से देखने का सिद्धांत
- पाँच महाव्रत, जिनमें अहिंसा सर्वोपरि
- श्रमण परंपरा को संगठित रूप
विरासत
जैन धर्म; और भारतीय विचार में अहिंसा तथा तर्क-सहिष्णुता की वह धारा जो सदियों बाद गांधी तक पहुँचती है।